अलौकिक शक्तियों के स्वामी थे बाबा नीम करौली, जानिये इनके बारे में

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Image result for neem karoli babaनीम करोली बाबा का वास्तविक नाम लक्ष्मीनारायण शर्मा था। उत्तरप्रदेश के अकबरपुर गांव में उनका जन्म 1900 के आसपास हुआ था। उन्होंने अपने शरीर का त्याग 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में किया था। बताया जाता है कि बाबा के आश्रम में सबसे ज्यादा अमेरिकी ही आते हैं। आश्रम पहाड़ी इलाके में देवदार के पेड़ों के बीच स्थित है,  यहां 5 देवी-देवताओं के मंदिर हैं। इनमें हनुमानजी का भी एक मंदिर है। बाबा नीम करोली हनुमानजी के परम भक्त थे और उन्होंने देशभर में हनुमानजी के कई मंदिर बनवाए थे। Related image

रिचर्ड एलपर्ट (रामदास) ने नीम करोली बाबा के चमत्कारों पर ‘मिरेकल ऑफ़ लव’ नामक एक किताब लिखी इसी में ‘बुलेटप्रूफ कंबल’ नाम से एक घटना का जिक्र है। बाबा के कई भक्त थे। उनमें से ही एक बुजुर्ग दंपत्ति थे जो फतेहगढ़ में रहते थे। यह घटना 1943 की है। एक दिन अचानक बाबा उनके घर पहुंच गए और कहने लगे वे रात में यहीं रुकेंगे। दोनों दंपत्ति को अपार खुशी तो हुई, लेकिन उन्हें इस बात का दुख भी था कि घर में महाराज की सेवा करने के लिए कुछ भी नहीं था। हालांकि जो भी था उन्हों बाबा के समक्ष प्रस्तुत कर दिया। बाबा वह खाकर एक चारपाई पर लेट गए और कंबल ओढ़कर सो गए। दोनों बुजुर्ग दंपत्ति भी सो गए, लेकिन क्या नींद आती। महाराजजी कंबल ओढ़कर रातभर कराहते रहे, ऐसे में उन्हें कैसे नींद आती। वे वहीं बैठे रहे उनकी चारपाई के पास। पता नहीं महाराज को क्या हो गया। जैसे कोई उन्हें मार रहा है। जैसे-तैसे कराहते-कराहते सुबह हुई। सुबह बाबा उठे और चादर को लपेटकर बजुर्ग दंपत्ति को देते हुए कहा इसे गंगा में प्रवाहित कर देना। इसे खोलकर देखना नहीं अन्यथा फंस जाओगे। दोनों दंपत्ति ने बाबा की आज्ञा का पालन किया। जाते हुए बाबा ने कहा कि चिंता मत करना महीने भर में आपका बेटा लौट आएगा।
जब वे चादर लेकर नदी की ओर जा रहे थे तो उन्होंने महसूस किया की इसमें लोहे का सामान रखा हुआ है, लेकिन बाबा ने तो खाली चादर ही हमारे सामने लपेटकर हमें दे दी थी। खैर, हमें क्या। हमें तो बाबा की आज्ञा का पालन करना है। उन्होंने वह चादर वैसी की वैसी ही नदी में प्रवाहित कर दी।

लगभग एक माह के बाद बुजुर्ग दंपत्ति का इकलौता पुत्र बर्मा फ्रंट से लौट आया। वह ब्रिटिश फौज में सैनिक था और दूसरे विश्वयुद्ध के वक्त बर्मा फ्रंट पर तैनात था। उसे देखकर दोनों बुजुर्ग दंपत्ति खुश हो गए और उसने घर आकर कुछ ऐसी कहानी बताई जो किसी को समझ नहीं आई।

उसने बताया कि करीब महीने भर पहले एक दिन वह दुश्मन फौजों के साथ घिर गया था। रातभर गोलीबारी हुई। उसके सारे साथी मारे गए लेकिन वह अकेला बच गया। मैं कैसे बच गया यह मुझे पता नहीं। उस गोलीबारी में उसे एक भी गोली नहीं लगी। रातभर वह जापानी दुश्मनों के बीच जिन्दा बचा रहा। भोर में जब और अधिक ब्रिटिश टुकड़ी आई तो उसकी जान में जा आई। यह वही रात थी जिस रात नीम करोली बाबा जी उस बुजुर्ग दंपत्ति के घर रुके थे।

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रेलवे स्टेशन पर चमत्कार

एक दिन बाबा गंगा स्नान के लिए अपनी गुफा से बाहर निकले ही थे कि उन्हें सामने लगभग दो सौ मीटर दूर रेल की पटरी पर फर्रुखाबाद की तरफ जाती हुई एक गाड़ी दिखाई दी। बाबा के साथ हर एकादशी और पूर्णमासी को गोपाल नामक एक बहेलिया और एक मुसलमान गंगा-स्नान के लिए जाया करते थे। यह बाबा की मौज थी कि उन्हें उस गाड़ी पर बैठकर जाने की इच्छा हुई। फिर क्या था, चलती गाड़ी एकाएक रुक गई और तब तक रुकी रहीजब तक कि बाबा अपने परिचरों के साथ उसमें सवार नहीं हो लिए। उनके बैठते ही गाड़ी चल पड़ी। चालक के लिए भी यह सब रहस्य बन कर रह गया। बाबा की इस लीला स्मृति में ग्रामवासियों के आग्रह पर भारत सरकार ने नीब करौरी ग्राम के इस स्थान पर अब लछमन दास पुरी रेलवे स्टेशन बना दिया है।

कुएं का जल मीठा किया

जिस स्थान पर बाबा वास कर रहे थे वहां के लिए विदित था कि पूर्व में किसी संत के श्राप से यह भूमि जलविहीन हो गई है। यहां बाबा ने ग्रामवासियों को जल के लिए तरसते हुए देखा। एक बार नि:सन्तान दुखी वैश्य ने बाबा के आगे दुखड़ा रोया कि उसने मेरे कोई संतान नहीं है, बाबा ने उसे हंसते हुए कहा कि श्री हनुमान जी के मन्दिर के आगे कुआं खुदवा दे, तेरे लड़का हो जाएगा। परन्तु जब कुआं खोदा गया तो पानी खारा निकला, तब बाबा जी ने कहा कि कुछ बोरे चीनी के डलवा दो सदा के लिए मीठा हो जाएगा। ऐसा ही किया गया आज भी उस कुएं का जल मीठा है।

बाबा का तेजस्वी स्वरूप

ईश्वरीय अवतारों में एक अनोखा संयोग बनता है। वे शरीर तो किसी मानव, पशु या अन्य जीव का धारण करते हैं, लेकिन उस शरीर में जो भावना, ऊर्जा, चेतना या आत्मा रहती है, वह पूरी तरह दैवीय रहती है। उनके आगमन और विदा लेने का भी एक विशिष्ट तरीका था। वह अचानक ही मानो प्रकट हो जाते थे और विदा लेकर अचानक चल देते थे और लोगों को पीछे आने को मना करते थे। चाहे वाहन से भी पीछा करो तो 100 गज की दूरी से अचानक किसी मोड़ पर विलुप्त हो जाते थे। कहा जाता है कि उन्होंने हनुमान जी की उपासना की थी और अनेक चामत्कारिक सिद्धियां प्राप्त की थीं।

गरीब भक्तों का मान बढ़ा देते थे बाबा

महाराज जी लखनऊ में अपने एक भक्त के यहां ठहरे थे और वहां भक्तों का जमघट लगा था। घर का सेवक भी एक रुपया टेंट में रखकर उनके दर्शनों के लिए वहां पहुंचा। जब उसने प्रणाम किया तो महाराज जी ने कहा अपनी कमर में खोसकर मेरे लिए रुपया लाया है। उसने हामी भरी। महाराज जी ने कहा तो मुझे देता क्यों नहीं? उसने रुपया निकालकर दिया और महाराज जी ने उसे प्रेमपूर्वक ग्रहण किया और बाद में अपने भक्तों से कहा इसका एक रुपया, आपके बीस हजार से अधिक मूल्यवान है।

संत-महात्मा भारत जैसे राष्ट्र की धरोहर होते हैं। इन्हीं अध्यात्मिक गुरुओं के कारण भारत आदिकाल से धर्म गुरु के रूप में विश्वगुरु बनकर विख्यात रहा है। वर्तमान युग में भी अनेक संत, ज्ञानी, योगी और प्रवचनकर्ता अपने कार्यों और चमत्कारों से विश्व को चमत्कृत करते रहे हैं परंतु बाबा नीम करौली जी की बात ही अलग थी।

नीम करोली बाबा का समाधि स्थल नैनीताल के पास पंतनगर में है। नीम करोली बाबा के भक्तों में एप्पल के मालिक स्टीव जॉब्स, फेसबुक के मालिक मार्क जुकरबर्क और हॉलीवुड एक्ट्रेस जूलिया रॉबर्ट्स का नाम लिया जाता है।

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